GPT-5: कभी यह कहा जाता था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंसान से भी ज्यादा समझदार हो जाएगा, हमारी नौकरियाँ ले लेगा और दुनिया पर कब्ज़ा कर लेगा। लेकिन अब ऐसा लगता है कि इस कहानी में अचानक ब्रेक लग गया है। 7 अगस्त 2025 को जब OpenAI ने लंबे इंतज़ार के बाद अपना नया मॉडल GPT-5 लॉन्च किया, तो लोगों ने सोचा था कि यह इतिहास बदल देगा। लेकिन हुआ ठीक उल्टा—GPT-5 को देखकर हर कोई निराश हो गया।
GPT-5 से उम्मीदें बड़ी थीं, नतीजे छोटे निकले
OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने लॉन्च से पहले दावा किया था कि GPT-5 किसी पीएचडी-लेवल एक्सपर्ट की तरह हर सवाल का जवाब देगा। लेकिन जब यूज़र्स ने इसे आज़माया, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। किसी ने यूएस का नक्शा माँगा तो GPT-5 ने ऐसे राज्य गढ़ दिए जो असल में हैं ही नहीं—“Tonnessee” और “West Wigina” जैसे। जब पहले 12 अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सूची मांगी गई, तो GPT-5 सिर्फ नौ नाम बता पाया, वो भी गलत स्पेलिंग के साथ—“Gearge Washington” और “Thomason Jefferson” जैसे।
लोग हैरान थे कि जिस मॉडल को दुनिया बदलने वाला बताया गया था, वह अपने पुराने वर्ज़न से भी कमजोर साबित हुआ। Reddit जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर यूज़र्स ने इसे “भयानक अनुभव” बताया। मजबूरी में OpenAI को पुराने वर्ज़न दोबारा चालू करने पड़े।
क्या AI इंडस्ट्री सिर्फ हाइप पर टिकी है?
GPT-5 की नाकामी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—क्या AI वाकई उतना क्रांतिकारी है, जितना हमें दिखाया जा रहा है, या यह सिर्फ एक और टेक्नोलॉजी बबल है? विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियाँ और निवेशक इसे लेकर इतना पैसा लगा रहे हैं, जैसे यह दुनिया की सबसे बड़ी खोज हो। लेकिन अभी तक कोई भी बड़ी AI कंपनी मुनाफे में नहीं आई है।
इतिहास गवाह है कि 1990 के दशक में “डॉट-कॉम” नाम वाली कंपनियाँ सिर्फ नाम के दम पर शेयर बाज़ार में चढ़ गई थीं। आज वही स्थिति AI को लेकर बन रही है। चिप निर्माता Nvidia को देखकर भी यही सवाल उठता है कि कहीं यह बुलबुला जल्द न फूट जाए।
बुद्धिमत्ता या सिर्फ दिखावा?
असल समस्या यह है कि AI को “बुद्धिमान” कहकर बेचा जा रहा है। लेकिन भाषा को सुंदर और संगठित तरीके से पेश करना और वास्तविक समझदारी में फर्क होता है। GPT-5 जैसी गलतियाँ यह साबित करती हैं कि AI अब भी सोचने-समझने वाला दिमाग नहीं, बल्कि सिर्फ एक भाषा का खेल है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि हम मशीनों को इंसानी रूप देने की गलती कर रहे हैं। जब इन्हें “हैलुसिनेशन” यानी भ्रम की स्थिति बताई जाती है, तो लगता है कि इनकी कोई अपनी सोच है। जबकि हकीकत यह है कि इनके पास न दिमाग है और न समझ—सिर्फ डेटा और एल्गोरिद्म हैं।
आगे का रास्ता
AI से बड़े पैमाने पर नौकरी छिनने की भविष्यवाणियाँ, प्रोडक्टिविटी में तेज़ उछाल और अरबों-खरबों डॉलर की कमाई के दावे अब धीरे-धीरे खोखले लगने लगे हैं। MIT के अर्थशास्त्री डैरन एसिमोग्लू का मानना है कि अगले दस सालों में AI अमेरिकी GDP में सिर्फ 1% तक ही योगदान देगा, जबकि दावे इससे कई गुना बड़े थे।
साफ है कि AI एक शक्तिशाली टूल है, लेकिन इसे दुनिया बदलने वाले चमत्कार की तरह बेचना शायद सिर्फ एक मार्केटिंग चाल है। GPT-5 की नाकामी हमें यह याद दिलाती है कि “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” कोई जादुई शब्द नहीं, बल्कि एक टेक प्रोडक्ट है—जिसके पीछे सीमाएँ भी हैं और हकीकत भी।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी और विश्लेषण के उद्देश्य से लिखा गया है। AI टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है और इसके परिणाम समय के साथ अलग हो सकते हैं। किसी भी निष्कर्ष या अनुमान को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।